क्या हम आजाद हैं?
क्या हम आजाद हैं?
भारत के संदर्भ में 15 अगस्त 1947 का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसा कहा और माना जाता है की आज ही के दिन भारत ने 200 वर्षों की पराधीनता के बाद अंग्रेजी हुकूमत से स्वतंत्रता पाई। तब से लेकर आज तक प्रत्येक भारतवासी इस दिन को पर्व मानकर बड़े ही उत्साह तथा हर्ष के साथ मनाता है। परंतु मेरे मन में आजादी को लेकर कुछ प्रश्न हैं, जिन्हें मैं यहां लिखने का प्रयास कर रहा हूं। क्या वाकई हम 15 अगस्त 1947 को आजाद हुए थे? या उस दिन महज़ सत्ता का परिवर्तन हुआ था। अंग्रेजों ने भारत की सत्ता छोड़कर तत्कालीन राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को सत्ता सौंप दी थी। तब से लेकर आज तक यदि हम देखें तो क्या हम वाकई अंग्रेजी मानसिकता से आजाद हुए या 1947 से कहीं अधिक अंग्रेजी मानसिकता व अंग्रेज़ीयत् के गुलाम हो गए हैं। वर्तमान समय में अंग्रेज़ीयत्,समाज में इस कदर पैठ बना चुकी है कि इससे आजादी पाना संभव नहीं लगता। चाहे वह भारत की शिक्षा व्यवस्था हो, हमारा पहनावा हो, हमारी भाषा हो, हमारा रहन-सहन हो या खानपन का तरीका। आप किसी भी भारतीय की सुबह से लेकर शाम तक की दिनचर्या को देखें तो आप पाएंगे कि उस पर अंग्रेजीयत् किस तरह से हावी हैै। हममें से अधिकांश लोग केवल नाम के भारतीय रह गए हैं वरन् हमारा जीवन, हमारी जीवन शैली व जीवन पद्धति पूर्ण रूप से अंग्रेज़ीयत् से सराबोर है। एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहूंगा। वर्तमान समय में, चाहे बड़े शहर का कोई परिवार हो अथवा किसी छोटे से गांव का परिवार बिना केक काटे व मोमबत्ती बुझाए जन्मदिन नहीं मनाया जाता। अंग्रेजीयत् ने हमें इस तरह अपना गुलाम बना लिया है कि हमें अपने भारतीय रीति-रिवाज अटपटे व अनचाहे से लगने लगे हैं। वर्तमान युवा पीढ़ी में रात्रि 12:00 बजे केक काटने का नया चलन शुरू हो गया है। जबकि भारतीय संस्कृति में रात्रिकाल को प्रेतकाल कहा गया हैै। इस युवा पीढ़ी के माता-पिता भी इन्हें रोकने की बजाय यह कहते हुए पाए जाते हैं कि क्या फर्क पड़ता है। भारतीय संस्कृति, सभ्यता वह रीति-रिवाज अब केवल कुछ ही प्रमुख त्योहारों पर देखने को मिलते हैं, परंतु उनमें भी अंग्रेज़ीयत् की मिलावट रहती है। हमारे अपने ही देश में भारतीय भाषा बोलने वालों को इतना सम्मान नहीं मिल पाता जितना अंग्रेजी बोलने वालों को। आज के समय में ज्ञान की परिभाषा ज्ञान से ना होकर केवल अंग्रेजी बोलने से मापी जाती है। इन सब का जिम्मेदार कौन है। 1947 में जब पहली सरकार बनी, तो उसकी यह जिम्मेदारी बनती थी कि वह भारतीय सभ्यता व संस्कृति को पुनः विकसित करें और उसे बढ़ावा देंं। उस समय हमें शिक्षा व्यवस्था में कुछ इस तरह के बदलाव करने चाहिए थे जिससे भारतीयता को बढ़ावा मिलता परंतु ऐसा नहीं किया गया। 1947 में बनी सरकार ने अंग्रेजों द्वारा किए गए कार्यों को और उन्हीं के द्वारा बनाई गई शिक्षा प्रणाली को आगे बढ़ाया और इस व्यवस्था में ऐसा कुछ नहीं था जिससे भारतीय संस्कृति व सभ्यता को बढ़ावा मिलता। नेहरू जी ने स्वयं इस बात को स्वीकार किया था कि वह जन्म से तो हिंदू हैं परंतु उनका रहन-सहन व सोच बिल्कुल अंग्रेज़ीयत् से प्रभावित थी। बाद की सरकारों ने भी ऐसा कोई प्रयास नहीं किया जिससे भारतीयता को बढ़ावा मिले। आजके समाज में माता-पिता भी इस बात पर कोई खास जोर नहीं देते कि उनके बच्चे भारतीय संस्कारों को सीखे और अपनाएं। सच कहूं तो हम आज भी अंग्रेजी सभ्यता के गुलाम हैं और इस गुलामी से छुटकारा मिल पाना असंभव तो नहीं परंतु अत्यंत कठिन हैै। आइए हम सब मिलकर एक प्रतिज्ञा लें, कि हम सब भारतीय संस्कृति व सभ्यता का पूरा सम्मान करेंगे और इसे ज्यादा से ज्यादा अपनाने का प्रयास करेंगे और अपनी आने वाली पीढ़ी को भी इसकेे प्रति जागरूक करेंगे।
प्रवेश पांडेय
बहुत सुंदर विचार
ReplyDeleteशत प्रतिशत सत्य सर। बहुत तकलीफ होती है जब टूटी फूटी अंग्रेज़ी बोलकर लोग कहते हैं I am not too good in Hindi जैसे इनकी कई पीढ़ियाँ इंग्लैंड में पली-बढ़ी हों और अपनी संस्कृति और संस्कारों से शर्म महसूस होती है । जब तक ऐसी मानसिकता को त्याग कर अपनी भाषा, खानपान और पहनावे का सम्मान करना नहीं सीखेंगे अंग्रेजियत की गुलामी से मुक्ति संभव नहीं। भले ही कितना ही Happy Independence day या Happy Republic day का राग अलापते रहें। बहुत बहुत बधाई सर इतना सुंदर लेख लिखने और इस सच्चाई को उजागर करने के लिए।
ReplyDeleteउत्तम
ReplyDeleteअत्युत्तम।बहुत सुंदर लेख भ्राता जी।
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