बचपन की दिवाली
बचपन की दिवाली मुझे आज भी याद है जब मैं छोटा था, तो हम तीनों भाई बहन पापा- मम्मी के साथ दिवाली से एक-दो दिन पहले बाज़ार जाया करते थे। जहां पापा- मम्मी घर के लिए दिवाली का सामान खरीदते थे, मिठाई खरीदते थे, घर को सजाने के लिए झालर वगैरह लेते थे। वही मेरा ध्यान पटाखे की दुकान पर ही रहता था, कि कब पापा पटाखे की दुकान पर चलेंगे। मैं उन्हें बार-बार टोका भी करता था। जब पापा मम्मी अपनी जरूरत का सारा सामान खरीद लेते थे, फिर अंत में हमें पटाखे की दुकान पर ले जाते और कहते देख लो जो लेना है। जब हम पटाखे खरीद रहे होते, तो बीच में टोका करते थे कि ज्यादा मत लेना, ज्यादा आवाज वाले मत लेना, कम खरीदो। उस समय मेरे मन में यह बात आती थी कि जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तब खूब पटाखे खरीदा करूंगा। बचपन का मन कहां मानता जो ठीक लगता हम खरीद लेते थे। फिर घर आने के बाद शुरू होता उन पटाखों को बार-बार देखने और रखने का सिलसिला। पटाखों को बार-बार निकालकर यही देखते रहते थे, कि पटाखे पूरे तो है ना। उन्हें बार-बार गिनते थे। फिर आती थी दिवाली की रात। पापा- मम्मी कहते कि पहले लक्ष्मी गणेश पूजा होगी उसके बाद जाना पटाखे जलाना। परं...