राम का धैर्य

राम का धैर्य
धैर्य का अर्थ है विपरीत परिस्थितियों में अपने आप पर काबू रखना। विपत्ति के समय व्याकुल ना होना अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों के होने पर भी स्वयं की मनोदशा पर नियंत्रण रखना। वर्तमान समय में मनुष्य में यदि किसी गुण का सबसे अधिक ह्रास हुआ है, तो वह है धैर्य। आज के युग में मनुष्य का धैर्य, पूर्ण रूप से समाप्त हो चुका है। आए दिन समाचार पत्रों के माध्यम से सुनने व पढ़ने को मिलता है, कि छोटी-छोटी बातों पर आपसी झगड़े हो गए अथवा किसी एक ने दूसरे की हत्या कर दी। यहां तक की गाड़ी की पार्किंग जैसी छोटी-छोटी बातों पर लोग आपस में लड़ लेते हैं। कार्यस्थल पर अथवा परिवार के अंदर भी छोटी-छोटी बातों को लेकर मनमुटाव हो जाता है। कभी-कभी यह मनमुटाव बड़े झगड़े का रूप ले लेता है। ऐसे में हमें जरूरत है की धैर्य को कैसे काबू रखना है, इसके बारे में जाने और सीखें। भगवान राम के धैर्य के बारे में पढ़ना वह उसे अपने जीवन में उतारना एक अच्छा कदम हो सकता है। राम ने अपने जीवन में आने वाली प्रत्येक विपरीत परिस्थिति का किस तरह धैर्यता पूर्वक सामना किया यह किसी से छुपा नहीं है। यदि हम राम के जीवन पर नजर डालें तो प्रारंभ से लेकर अंत तक अनेकानेक विपरीत परिस्थितियां राम के जीवन में आई, परंतु राम ने कभी अपने धैर्य को नहीं छोड़ा और हमेशा संयम बनाए रखा। जहां एक तरफ राम के राजतिलक की तैयारियां चल रही थी। चारों तरफ हंसी खुशी का माहौल था। पूरी जनता में राम के राज्याभिषेक को लेकर उत्साह का माहौल था। स्वयं राम भी अपने राजतिलक को लेकर उत्साहित थे और पिता की आज्ञा का पालन करने को उत्सुक थे। वही प्रातः होते ही उन्हें समाचार मिलता है कि अब राजतिलक उनका नहीं बल्कि उनके अनुज भरत का होगा। यह सुनने के बाद भी राम अपना धैर्य नहीं खोते और ना ही विचलित होते हैं। राम ना ही अपने पिता से इस संदर्भ में कोई प्रश्न करते हैं और इसे अपने पिता की आज्ञा मानकर, वन को प्रस्थान कर जाते हैं। वह मनुष्य जिसे ना कुछ पाने की खुशी हो और ना ही कुछ खोने का दुख वह राम ही हो सकता है। वहीं वन में जब राम की पत्नी को रावण छल से हर लेता है, तब राम क्षण भर के लिए विचलित जरूर होते हैं, परंतु अपना धैर्य नहीं खोते और अपने अनुज लक्ष्मण के साथ सीता की खोज में लग जाते हैं। वन- वन भटकते हुए राम जब सीता की खोज कर रहे थे, तो मार्ग में ऐसी कई परिस्थितियां आई जब वह अपना धैर्य खो सकते थे, परंतु ऐसा नहीं हुआ। राम ने कभी भी परिस्थितियों को स्वयं पर हावी नहीं होने दिया। राम हर परिस्थिति पर विजय प्राप्त कर आगे बढ़े। राम के धैर्य की परीक्षा तब भी होती है जब वह समुद्र से लंका पार करने का मार्ग मांगते हैं। राम समुद्र से धैर्य पूर्वक तीन दिनों तक विनती करते हैं, परंतु जब तीन दिन बाद भी समुद्र से कोई उत्तर नहीं मिलता, तब वे अपना धनुष उठाते हैं। राम जैसा धैर्यवान पुरुष इतिहास में कोई और नहीं। राम ने अपने पूरे जीवन में कभी भी धैर्य को नहीं छोड़ा और प्रत्येक विपरीत परिस्थिति का धैर्य पूर्वक सामना किया। हम आम जन को भी राम के जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए और स्वयं को धैर्यवान बनाना चाहिए। जब भी आपके जीवन में कोई विषम परिस्थिति आए या किसी ऐसे व्यक्ति से आप का सामना हो, जिसकी बातों से आपका धैर्य टूटने लगे। तो प्रभु राम को याद करें, संयम बनाए रखें, धैर्यशीलता का प्रदर्शन करें। यदि आप धैर्यवान होंगे तो ना केवल आपसी झगड़ों से बचेंगे वरन् अपने लक्ष्य की ओर और तीव्रता से आगे बढ़ेंगे।

प्रवेश पांडेय

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