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वेदों पर संक्षिप्त व्याख्यान

सियाराम मय सब जग जानी, करहु प्रणाम जोरी जुग पानी। मंदिर में उपस्थित सभी महानुभावों को मेरा प्रणाम। आज मुझे दिल्ली पूर्वांचल समिति के इस मंच पर वेदों के महत्व केविषय में संक्षिप्त प्रकाश डालने के लिए कहा गया है।  वैसे तो मेरे द्वारा वेदों  के विषय में कुछ कहना सूर्य को दीया दिखाने के बराबर है। बात करते हैं वेद के शाब्दिक अर्थ कि, वेद शब्द संस्कृत धातु विद् से बना है जिसका अर्थ है जानना या ज्ञान प्राप्त करना। अतः वेद का शाब्दिक अर्थ है ज्ञान या परम सत्य का ज्ञान। वेदों को लेकर सबके मन में यह जिज्ञासा बनी रहती है की वेद कितने पुराने है और किसने लिखे है। वेदों के बारे में हम कह सकते हैं कि वेद मानव सभ्यता का सबसे प्राचीन ग्रंथ है और यह पृथ्वी पर सृष्टि के प्रारंभ से ही है। इस सृष्टि की उत्पत्ति करीब एक अरब 96 करोड़ 53000 वर्ष पूर्व हुई थी। अर्थात् वेद भी लगभग इतने ही प्राचीन है। वेदों को अपौरुषेय कहा जाता है, अर्थात् वेद की रचना किसी मनुष्य ने नहीं की है। सृष्टि के प्रारंभ में ऋषियों और मुनियों ने अपने तप और साधना के बल पर, ईश्वर से श्रुति अर्थात सुनने के माध्यम से प्राप्त किया। फ...

मोबाइल फोन

पहले जब मेरा बच्चा घर से बाहर खेलने जाता था, तो मुझे चिंता होती थी कि कहीं बाहर जाकर बिगड़ ना जाए। कहीं गलत संगत में ना पड़ जाए। थोड़ा सा भी लेट होने पर मुझे चिंता हो जाती थी। मैं उसे ढूंढने बाहर तक चला जाता था। आस पड़ोस के घरों में पूछताछ करता था। उसके देर से घर आने पर सवाल-जवाब करता था। उसे समझाता था। मेरी कोशिश यही रहती थी कि मेरा बच्चा किसी गलत चीज के संपर्क में ना आए। परंतु आज मोबाइल मेरे बच्चे को मेरी आंखों के सामने बिगाड़ रहा है और मैं चुपचाप उसे देख रहा हूं। मेरा बच्चा मोबाइल पर घंटों बीता रहा है, वीडियो देख रहा है, गेम खेल रहा है और मैं लाचार हूं। ना किसी से शिकायत कर सकता हूं और ना ही किसी से अपनी समस्या बता सकता हूं। क्योंकि आज हर घर की यही कहानी है। मैं परेशान हूं, लाचार हूं। मेरी आंखों के सामने मोबाइल मेरे बच्चे को निगल रहा है और मैं भरे मन से यह सब होते देख रहा हूं। आज मैं चाहता हूं, कि मेरा बच्चा बाहर जाए खेले, नए दोस्त बनाए। किंतु खेलने के नाम पर उसे सिर्फ मोबाइल पर ही गेम खेलना पसंद है। फेसबुक पर तो उसके कई दोस्त हैं, पर बैठकर बात करने वाला उसका कोई दोस्त नहीं। ट्विटर ...

राम का धैर्य

राम का धैर्य धैर्य का अर्थ है विपरीत परिस्थितियों में अपने आप पर काबू रखना। विपत्ति के समय व्याकुल ना होना अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों के होने पर भी स्वयं की मनोदशा पर नियंत्रण रखना। वर्तमान समय में मनुष्य में यदि किसी गुण का सबसे अधिक ह्रास हुआ है, तो वह है धैर्य। आज के युग में मनुष्य का धैर्य, पूर्ण रूप से समाप्त हो चुका है। आए दिन समाचार पत्रों के माध्यम से सुनने व पढ़ने को मिलता है, कि छोटी-छोटी बातों पर आपसी झगड़े हो गए अथवा किसी एक ने दूसरे की हत्या कर दी। यहां तक की गाड़ी की पार्किंग जैसी छोटी-छोटी बातों पर लोग आपस में लड़ लेते हैं। कार्यस्थल पर अथवा परिवार के अंदर भी छोटी-छोटी बातों को लेकर मनमुटाव हो जाता है। कभी-कभी यह मनमुटाव बड़े झगड़े का रूप ले लेता है। ऐसे में हमें जरूरत है की धैर्य को कैसे काबू रखना है, इसके बारे में जाने और सीखें। भगवान राम के धैर्य के बारे में पढ़ना वह उसे अपने जीवन में उतारना एक अच्छा कदम हो सकता है। राम ने अपने जीवन में आने वाली प्रत्येक विपरीत परिस्थिति का किस तरह धैर्यता पूर्वक सामना किया यह किसी से छुपा नहीं है। यदि हम राम के जीवन पर नजर डालें तो प...

गोरा - बादल

गोरा - बादल: नरेंद्र मिश्र दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई क़ुरबानी जिसके कारण मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी रावल रत्न सिंह को छल से कैद किया खिलजी ने कालजई मित्रों से मिलकर दगा किया खिलजी ने खिलजी का चित्तौड़दुर्ग में एक संदेशा आया जिसको सुनकर शक्ति शौर्य पर फिर अँधियारा छाया दस दिन के भीतर न पद्मिनी का डोला यदि आया यदि ना रूप की रानी को तुमने दिल्ली पहुँचाया तो फिर राणा रत्न सिंह का शीश कटा पाओगे शाही शर्त ना मानी तो पीछे पछताओगे यह दारुण संवाद लहर सा दौड़ गया रण भर में यह बिजली की तरह क्षितिज से फैल गया अम्बर में महारानी हिल गयीं शक्ति का सिंहासन डोला था था सतित्व मजबूर जुल्म विजयी स्वर में बोला था रुष्ट हुए बैठे थे सेनापति गोरा रणधीर जिनसे रण में भय खाती थी खिलजी की शमशीर अन्य अनेको मेवाड़ी योद्धा रण छोड़ गए थे रत्न सिंह की संधि नीति से नाता तोड़ गए थे पर रानी ने प्रथम वीर गोरा को खोज निकाला वन वन भटक रहा था मन में तिरस्कार की ज्वाला गोरा से पद्मिनी ने खिलजी का पैगाम सुनाया मगर वीरता का अपमानित ज्वार नहीं मिट पाया बोला मैं तो बहुत तुच्छ हू राजनीति क्या जानूँ निर्वासित हूँ राज मुकु...

ईश्वर की स्तुति - प्रार्थना – उपासना के मंत्र

ईश्वर की स्तुति - प्रार्थना – उपासना के मंत्र ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव । यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥१॥ मंत्रार्थ – हे सब सुखों के दाता ज्ञान के प्रकाशक सकल जगत के उत्पत्तिकर्ता एवं समग्र ऐश्वर्ययुक्त परमेश्वर! आप हमारे सम्पूर्ण दुर्गुणों, दुर्व्यसनों और दुखों को दूर कर दीजिए, और जो कल्याणकारक गुण, कर्म, स्वभाव, सुख और पदार्थ हैं, उसको हमें भलीभांति प्राप्त कराइये। हिरण्यगर्भ: समवर्त्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥२॥ मंत्रार्थ – सृष्टि के उत्पन्न होने से पूर्व और सृष्टि रचना के आरम्भ में स्वप्रकाशस्वरूप और जिसने प्रकाशयुक्त सूर्य, चन्द्र, तारे, ग्रह-उपग्रह आदि पदार्थों को उत्पन्न करके अपने अन्दर धारण कर रखा है, वह परमात्मा सम्यक् रूप से वर्तमान था। वही उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत का प्रसिद्ध स्वामी केवल अकेला एक ही था। उसी परमात्मा ने इस पृथ्वीलोक और द्युलोक आदि को धारण किया हुआ है, हम लोग उस सुखस्वरूप, सृष्टिपालक, शुद्ध एवं प्रकाश-दिव्य-सामर्थ्य युक्त परमात्मा की प्राप्ति के लिये ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास व हव्य पदार्थों द्व...

बचपन की दिवाली

बचपन की दिवाली मुझे आज भी याद है जब मैं छोटा था, तो हम तीनों भाई बहन पापा- मम्मी के साथ दिवाली से एक-दो दिन पहले बाज़ार जाया करते थे। जहां पापा- मम्मी घर के लिए दिवाली का सामान खरीदते थे, मिठाई खरीदते थे, घर को सजाने के लिए झालर वगैरह लेते थे। वही मेरा ध्यान पटाखे की दुकान पर ही रहता था, कि कब पापा पटाखे की दुकान पर चलेंगे। मैं उन्हें बार-बार टोका भी करता था। जब पापा मम्मी अपनी जरूरत का सारा सामान खरीद लेते थे, फिर अंत में हमें पटाखे की दुकान पर ले जाते और कहते देख लो जो लेना है। जब हम पटाखे खरीद रहे होते, तो बीच में टोका करते थे कि ज्यादा मत लेना, ज्यादा आवाज वाले मत लेना, कम खरीदो। उस समय मेरे मन में यह बात आती थी कि जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तब खूब पटाखे खरीदा करूंगा। बचपन का मन कहां मानता जो ठीक लगता हम खरीद लेते थे। फिर घर आने के बाद शुरू होता उन पटाखों को बार-बार देखने और रखने का सिलसिला। पटाखों को बार-बार निकालकर यही देखते रहते थे, कि पटाखे पूरे तो है ना। उन्हें बार-बार गिनते थे। फिर आती थी दिवाली की रात। पापा- मम्मी कहते कि पहले लक्ष्मी गणेश पूजा होगी उसके बाद जाना पटाखे जलाना। परं...

The Future of Electric Vehicles in India

                                                       The Future of Electric Vehicles in India  Electric Vehicles (EVs) are a sustainable transportation sector in the future because of their extremely low to zero carbon emissions, great efficiency and low noise pollution. Electric vehicles can be the new trend considering the current environmental conditions in the country. The Indian automobile industry has enabled the enlargement of the electric vehicle sector in India. EVs have become the promising and trusted channel for the improvement of air quality, energy security, and resource management problems. The government and auto sector companies have recognized the potential of alternative fuel vehicles (AFVs) for environmentally friendly transportation, and auto sector companies have been enacting measures to boost t...