सीता के राम
सीता के राम
सीता और राम की अमर प्रेम कथा पूरे विश्व में विख्यात है। इस अमर गाथा में कई ऐसे बिंदु हैं, जो आमजन के बीच चर्चा का विषय बने रहते हैं। वैसे तो पूरी गाथा में सभी के लिए बहुत कुछ सीखने के लिए है। परंतु एक विषय हमेशा लोगों के बीच खासकर महिलाओं के बीच चर्चा का विषय बना रहता है, कि राम ने एक धोबी के कहने पर सीता का त्याग कर उन्हें वन में क्यों भेज दिया। इस निर्णय को लेते समय राम के मन में क्या विचार रहे होंगे, यह तो राम ही जाने। मैंने इस विषय पर अलग-अलग पुस्तकों में जो कुछ भी पढ़ा है, उसे यहां संक्षेप में लिखने का प्रयास कर रहा हूं।
क्या राम सीता से प्रेम नहीं करते थे? जो उन्होंने सीता को वन भेज दिया। यहां यह बात स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि राम और सीता का प्रेम मानव इतिहास का सबसे अटूट व पवित्र प्रेम है। जहां पहले राजा द्वारा कई पत्नियां रखने का प्रचलन था, वही राम ने सीता को विवाह की प्रथम रात्रि को ही यह वचन दिया था, कि राम कभी भी दूसरा विवाह नहीं करेंगें और इस वचन को राम में पूर्ण रूप से निभाया भी। राम के जीवन में ऐसे कई अवसर आए जब सीता जी उनके साथ नहीं थी। वे चाहते तो दूसरा विवाह कर सकते थे। परंतु राम ने ऐसा नहीं किया राम के मन में सीता के लिए अटूट प्रेम ही था, जो राम द्वारा सीता को खोजते - खोजते इतनी दूर लंका तक ले गया। सीता को वापस पाने के लिए राम ने रावण समस्त सभी राक्षसों का वध किया। आज के समय में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि कोई अपनी पत्नी को ढूंढने के लिए पंचवटी से लंका तक की यात्रा पैदल तय कर सकता है। राम ऐसे पहले राजा थे जिन्होंने अपनी पत्नी सीता को राज्यसभा में अपने साथ सिंहासन पर बैठाया। फिर आखिर राम के मन में ऐसा क्या आया? जो उन्होंने सीता को वन जाने को कहा।
राज्यसभा के उस दृश्य को याद करिए। राम और सीता सिंहासन पर बैठे हैं और दुर्मुख नामक धोबी की पत्नी अपने पति के ऊपर आरोप लगा रही है, कि उसका पति उसे घर नहीं आने दे रहा। प्रतिउत्तर में धोबी कहता है, कि हां महाराज मैंने इसका त्याग कर दिया है क्योंकि यह पूरा एक दिन बिना मेरी जानकारी के घर से बाहर रही है। पूछने पर कोई सही उत्तर नहीं दे रही। उल्टा मुझसे ही यह प्रश्न कर रही है कि तुम राजा राम से भी बड़े ज्ञानी और समझदार हो क्या? उनकी पत्नी भी एक दिन तो क्या पूरा एक वर्ष बिना उनकी जानकारी के उनसे दूर रही। इसके बाद भी राजा राम ने अपनी पत्नी को सम्मान सहित स्वीकार किया। फिर तुम्हें आपत्ति क्यों है? हम प्रजा हैं और हमें अपने राजा का अनुसरण करना चाहिए। धोबी की पत्नी बोली, जब हमारे राजा पूरे एक वर्ष स्वयं से दूर रही पत्नी को स्वीकार कर सकते हैं, तो तुम मुझे स्वीकार क्यों नहीं कर सकते। क्या तुम राजा से भी बड़े ज्ञानी हो या उनसे भी बड़े धर्मात्मा हो। अपनी पत्नी की बात सुन धोबी बोला मैं कोई राजा नहीं हूं, जो सब कुछ देखते हुए भी अपनी आंखें बंद कर लूं। महाराज आप ही बताइए, स्त्री तो घर की मान मर्यादा होती है। उसके चरित्र का शक के दायरे में आना, पूरे परिवार को कलंकित करता है। अब ऐसे में, यदि मैं इसे साथ रखता हूं, तो परिवार और समाज के लोग मुझपर उंगली उठाएंगे। इसलिए मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता। आप राजा है। आप भले ही अपनी पत्नी का त्याग ना करें, परंतु मैं एक सामान्य व्यक्ति हूं। मेरे लिए यह संभव नहीं।
दोनों की बातें सुन राम को ऐसा लगा जैसे पैरों तले जमीन खिसक गई हो। राजा राम किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए थे। उनके पास शब्द नहीं थे, कि वह इस संदर्भ में क्या निर्णय दें। एक बार तो उन्हें विचार आया कि धोबी द्वारा सीता के संदर्भ में कही गई बातों पर उसे मृत्युदंड दे। राम स्वयं नहीं समझ पा रहे थे कि कोई उनकी प्रिय पत्नी सीता के संदर्भ में ऐसा कह रहा है और वह अभी तक उनके सम्मुख जीवित है। राम के मन में सीता को लेकर तनिक भी संदेह नहीं था। उन्होंने प्रजा की संतुष्टि के लिए सीता को अग्नि परीक्षा से गुजरने के लिए कहा था। परंतु यह क्या, अग्नि परीक्षा के उपरांत भी प्रजा सीता के विषय में ऐसा विचार रखती है। राम समझ रहे थे कि कोई भी राजा अपनी प्रजा को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर सकता।
रात्रि के समय, जब राम ने कक्ष में प्रवेश किया तब राम के मन में कई प्रश्न चल रहे थे। राज्य सभा का वह दृश्य तथा धोबी की कही बातें अभी तक मन को कौंध रही थी। राम यह कभी नहीं चाहते थे, कि भविष्य में आने वाली पीढ़ी सीता को लेकर मन में कोई शंका रखें। इसलिए उन्होंने सीता को भविष्य में दोष मुक्त रखने के लिए खुदका दोषी होना स्वीकार किया। राम जानते थे कि भविष्य में लोग उनके इस निर्णय पर प्रश्नचिन्ह अवश्य लगाएंगे। परंतु ऐसा करके उन्होंने सीता के चरित्र पर उठने वाले सवालों पर जरूर विराम लगा दिया। वहीं दूसरी ओर, सीता राम के मन में चल रही बातों को भलीभांति समझ रही थी। वह जानती थी कि राम उनसे कितना स्नेह करते हैं। सीता ने राम के समीप जाकर कहा, प्रभु आप मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। आप एक आदर्श राजा है। मेरे लिए आप हमेशा मेरे आदर्श पति रहेंगे, परंतु प्रजा के मन में आप को लेकर कभी कोई संदेह नहीं होना चाहिए। मेरे प्रति लिया गया आपका कोई भी निर्णय, आपकी मर्यादा को धूमिल नहीं कर सकता। आप मुझसे जितना स्नेह करते हैं, उससे कहीं अधिक मैं आपसे करती हूं। इसलिए मैंने निर्णय लिया है कि मैं स्वयं वन को प्रस्थान करूंगी। यह सुनकर राम असहज हो गए और उनके नेत्र भर आए। दोनों के मध्य चली लंबी वार्तालाप के बाद सीता जी ने प्रातः वन को प्रस्थान किया। सीता के जाने के बाद राम ने राजा होते हुए भी वनवासी का ही जीवन व्यतीत किया।
अब अयोध्या की प्रजा के बीच सीता के चरित्र को लेकर कोई चर्चा नहीं थी। चर्चा थी तो बस, इस बात की, कि आखिर राम ने एक धोबी के कहने पर सीता का त्याग क्यों कर दिया। इस तरह राम ने सीता की तरफ उठने वाली समस्त उंगलियों को अपनी तरफ मोड़ लिया।
प्रवेश पांडेय
बहुत सुंदर लेख है यथार्थ एक दर्शन है इसमें
ReplyDeleteजय श्री राम
ReplyDeleteBahut hi badhia sir.
ReplyDeleteEk or topic par likhna sir
Kya Lakshman ji ka apne akele mata pita ko chodkar shree ram ji saath van mai jana uchit tha ya nahi
Geetapress gorakhpur mai ye vivad chida hai
बहुत सुंदर विश्लेषण।
ReplyDeleteMr Pravesh. Kindly get in touch with your M.Phil Supervisor. Its urgent.I have sent you a message on your facebook account too. Kindly contact
ReplyDeleteHello all. If anyone is in touch with Mr Pravesh Pandey, please pass this message to him to get in touch with his MPhil supervisor at the phone number given in the message in his Facebook account. Its very urgent and I don't have his mail id or phone number. Anyone, kindly pass this message to him.I would be grateful.
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