मनुष्य अपने विनाश का कारण स्वयं
मनुष्य अपने विनाश का कारण स्वयं। क्या मानव जाति विनाश की ओर अग्रसर है? या प्रगति की ओर। क्या जिसे मनुष्य अपना विकास समझ कर खुश हो रहा है असल में वही उसके विनाश का कारण है? क्या सही मायने में मनुष्य प्रगति कर रहा है? क्या वर्तमान की प्रगति मनुष्य को विनाश की ओर ले जा रही है? क्या आज के समय में टूटते हुए समाज व बिखरते हुए परिवार प्रगति की निशानी है? एक कहावत प्रचलित है कि मनुष्य जो गड्ढा दूसरों के लिए खोदता है स्वयं उसी का ग्रास बनता है। तो क्या आज के समय की प्रगति वही गड्ढा है जिसमें मनुष्य एक दिन स्वयं गिरेगा। प्रगति के सही मायने क्या हैं। क्या अधिक से अधिक धन अर्जित करना बड़े-बड़े कोठियों व बंगलों में रहना लंबी - लंबी गाड़ियों में घूमना ही प्रगति है? क्या जिन लोगों के पास यह सब सुख सुविधाएं हैं वह स्वयं को प्रगतिवान समझ सकते हैं? आखिर प्रगति की परिभाषा क्या है? आज के समय में मनुष्य के बाहरी और आंतरिक जीवन में भारी अंतर है। जहां एक तरफ मनुष्य अपने बाहरी जीवन में खुद को मिलनसार सब का हितैषी दिखाने का दिखावा करता है। तो अंदर ही अंदर वह दूसरों के विकास के प्रति द्वेष रखता है। आज के समय मे...