मोबाइल फोन
पहले जब मेरा बच्चा घर से बाहर खेलने जाता था, तो मुझे चिंता होती थी कि कहीं बाहर जाकर बिगड़ ना जाए। कहीं गलत संगत में ना पड़ जाए। थोड़ा सा भी लेट होने पर मुझे चिंता हो जाती थी। मैं उसे ढूंढने बाहर तक चला जाता था। आस पड़ोस के घरों में पूछताछ करता था। उसके देर से घर आने पर सवाल-जवाब करता था। उसे समझाता था। मेरी कोशिश यही रहती थी कि मेरा बच्चा किसी गलत चीज के संपर्क में ना आए। परंतु आज मोबाइल मेरे बच्चे को मेरी आंखों के सामने बिगाड़ रहा है और मैं चुपचाप उसे देख रहा हूं। मेरा बच्चा मोबाइल पर घंटों बीता रहा है, वीडियो देख रहा है, गेम खेल रहा है और मैं लाचार हूं। ना किसी से शिकायत कर सकता हूं और ना ही किसी से अपनी समस्या बता सकता हूं। क्योंकि आज हर घर की यही कहानी है। मैं परेशान हूं, लाचार हूं। मेरी आंखों के सामने मोबाइल मेरे बच्चे को निगल रहा है और मैं भरे मन से यह सब होते देख रहा हूं। आज मैं चाहता हूं, कि मेरा बच्चा बाहर जाए खेले, नए दोस्त बनाए। किंतु खेलने के नाम पर उसे सिर्फ मोबाइल पर ही गेम खेलना पसंद है। फेसबुक पर तो उसके कई दोस्त हैं, पर बैठकर बात करने वाला उसका कोई दोस्त नहीं। ट्विटर पर तो उसके कई फॉलोअर हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर उसके पीछे खड़ा होने वाला कोई नहीं। इस मोबाइल ने लोगों के जीवन को जितना आसान नहीं बनाया, बल्कि उससे कहीं अधिक बर्बाद किया है। मोबाइल का लोगों के जीवन पर बढ़ता प्रभाव एक चिंता का विषय है। परिवार को, समाज को व सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए। मोबाइल ने लोगों को परिवार व समाज से दूर किया है। इस पर अंकुश लगाना जरूरी है नहीं तो यह निरंकुश हो जाएगा और आने वाली पीढ़ियां समाज शब्द का अर्थ ही भूल जाएंगी।
प्रवेश पांडेय
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