धर्म क्या है?

धर्म क्या है? यह प्रश्न अपने आप में अत्यंत गंभीर और गूढ़ विषय है और कई मायनों में यह प्रश्न संवेदनशील भी है। सही अर्थों में धर्म क्या है? समय-समय पर अनेक वक्ताओं ने अपने विचार इस विषय पर प्रकट किए हैं। मैंने भी इस विषय पर थोड़ा बहुत अध्ययन किया और उस अध्ययन के उपरांत मैंने जो कुछ भी समझा, जो कुछ भी जाना उसी को शब्दों में लिखने का एक प्रयास कर रहा हूं। आप मेरे इस प्रयास से अथवा मेरे विचार से सहमत या असहमत हो सकते हैं। परंतु मेरे विचारों को सिरे से नकार नहीं सकते। मेरे मन में अक्सर धर्म को लेकर कुछ बातें चला करती थी या यूं कहें कि कुछ जिज्ञासा मन में बनी रहती थी? उन्हीं जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए मैंने इस विषय में पढ़ना प्रारंभ किया। सबसे पहले मैं उन जिज्ञासाओं के बारे में चर्चा करना चाहूंगा, जो इस विषय से जुड़ी हुई हैं कि धर्म क्या है? क्या धर्म का अर्थ किसी ईश्वर विशेष को मानना है? क्या किसी विशेष पंत, समुदाय अथवा मत से जुड़े होना ही धर्म है? क्या ईश्वर को प्राप्त करने के लिए जो अलग-अलग पूजा पद्धतियां हैं, उनको मानने वाले लोग अलग-अलग धर्म के हैं? क्या हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख आदि की अलग-अलग पूजा पद्धतियों को मानने वाले लोग अलग-अलग धर्म के हैं। या यूं कहें कि उनका धर्म अलग है। यदि मैं स्वयं के लिए यह कहूं कि मैं हिंदू धर्म को मानने वाला हूं। तो क्या यह अपने आप में सही है? ऐसी कई प्रश्न है जो मन में बार-बार धर्म को लेकर आते रहते हैं। 
श्री कृष्ण के कहे अनुसार धर्म का अर्थ है धारण करना। अर्थात् जो धारण करने योग्य है वही धर्म है। ग्रंथों में अलग-अलग व्यक्तियों के लिए धारण करने योग्य अलग-अलग बातें लिखी गई है। समाज में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग संबंधों से जुड़ा होता है। जैसे एक ही व्यक्ति किसी का पुत्र है। किसी का भाई है। किसी का पिता है। किसी का पति है। वह शिक्षक भी हो सकता है। चिकित्सक भी हो सकता है। कहीं का शासक भी हो सकता है। इसी प्रकार एक ही स्त्री अलग-अलग रिश्तों को निभाती है। कहीं वह पुत्री है। कहीं बहन है। कहीं माता है। कहीं पत्नी है। व कहीं जननी है। वह अन्य किसी राजकीय या सामाजिक पद पर भी हो सकती है। प्रत्येक व्यक्ति का धर्म उसके सामाजिक रिश्ते, सामाजिक कार्य व सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ा होता है। जैसे एक पुत्र के रूप में व्यक्ति का धर्म होता है कि वह अपने पिता की आज्ञा का पालन करें। वही एक पिता के रूप में व्यक्ति का धर्म होता है कि वह अपने बालक व बालिका को अच्छी शिक्षा, अच्छा स्वास्थ्य और सुख सुविधाएं उपलब्ध कराएं। वही व्यक्ति यदि शिक्षक है, तो एक शिक्षक का धर्म है कि वह अपने सभी छात्रों को बिना किसी भेदभाव के समभाव से शिक्षा प्रदान करें। वह उनकी समस्याओं का निवारण करें। वही व्यक्ति यदि किसी राज्य का शासक है, तो एक शासक होने के नाते जनता के प्रति अपने कर्तव्यों का पूरी श्रद्धा के साथ पालन करना ही उस शासक का धर्म होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति किसी प्रतिष्ठित पद पर है और वह अपने पद का दुरुपयोग कर रहा है। तो हम ऐसा कह सकते हैं, कि अमुक व्यक्ति उस पद के धर्म का पालन नहीं कर रहा है।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता के उपदेश में कहा था कि यदि धर्म की रक्षा के लिए तुम्हें अपने परिवारजनों का भी संहार करना पड़े तो पीछे मत हटो। क्या श्रीकृष्ण का यहां धर्म से अभिप्राय हिंदू धर्म की रक्षा से था या सनातन धर्म की रक्षा से। नहीं। बिल्कुल नहीं। श्री कृष्ण का यहां धर्म से अभिप्राय उन कर्तव्यों, नैतिक मूल्यों व नीति संगत व्यवहारों से था, जिसका पालन कौरवों ने कभी नहीं किया और जिसकी वजह से पांडवों को राज्य से वंचित होना पड़ा तथा अपमान का पात्र बनना पड़ा।
धर्म के संदर्भ में रामायण का जिक्र करना अत्यंत आवश्यक है। रामायण से हम सभी तरह की धर्म संगत बातों को अच्छे से सीख सकते हैं। जैसे राम ने पुत्र धर्म को निभाते हुए कभी भी अपने पिता की आज्ञा का निरादर नहीं किया, चाहे उसके लिए उन्हें वनवास ही क्यों ना जाना पड़ा हो। सीता ने अपने पति धर्म का पालन करते हुए महलों की सुख-सुविधाओं का त्याग कर पति के साथ वन को जाना सुनिश्चित किया। वहीं भ्राता लक्ष्मण जो प्रारंभ से ही स्वयं को राम को समर्पित कर चुके थे, उन्होंने भी एक क्षण के लिए अन्यथा ना सोचते हुए, राम के साथ वन गमन किया। जहां प्राचीन काल में एक से अधिक विवाह किए जाते थे, वहीं राम ने पति धर्म का पालन करते हुए सिर्फ एक पत्नी व्रत को धारण किया। भरत में भी अपने भाई धर्म का पालन करते हुए कई बार राम से अयोध्या का राजा बनने का अनुरोध किया। परंतु जब राम नहीं माने तब उन्होंने राम की चरण पादुका को ही राजा मानकर अयोध्या पर शासन किया। राम को यदि हम एक राजा के रूप में देखें तो उन्होंने राजा के धर्म को भलीभांति परिभाषित किया। अपनी प्रजा की भलाई व उनके विश्वास को जीतने के लिए उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। यहां तक की राज्य धर्म का पालन करने के लिए व अपनी प्रजा में अपनी निष्ठा बनाए रखने के लिए, उन्हें अपनी प्रिय पत्नी तक का त्याग करना पड़ा। अर्थात् उन्होंने राज्य धर्म को अपने पति धर्म से ऊपर रखा। वर्तमान समय के शासकों के लिए यह बात सीखने योग्य है। 
मेरे विचार से धर्म का अर्थ है अपने नैतिक मूल्यों, सामाजिक कर्तव्यों, व पारिवारिक रिश्तों में सामंजस्य बिठाते हुए, उनका पूरी निष्ठा व ईमानदारी से पालन करना। जो लोग किसी पंथ या समुदाय या किसी विशेष पूजा पद्धति को मानने को ही धर्म की संज्ञा देते हैं, यह ऐसे व्यक्तियों की संकुचित सोच को दर्शाता है। धर्म का अर्थ संकुचित नहीं है वरन् बहुत व्यापक है। जिसे समझना और धारण करना सरल नहीं। कई बार मनुष्यों के सामने ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं, जब उन्हें दो धर्मो के बीच किसी एक को चुनना पड़ता है। वर्तमान समय में देखें तो अक्सर घरों में ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं जब किसी व्यक्ति को माता-पिता के प्रति धर्म और पत्नी के पति धर्म के बीच आपसी टकराव का सामना करना पड़ता है। बुद्धिमान व्यक्ति वही कहलाता है जो सही समय पर सही धर्म का पालन करता है। अतः निष्कर्ष के तौर पर मैं यही कहना चाहूंगा कि आपका धर्म, आपके विचार, आप के निर्णय, आपके सामाजिक व पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वाह अथवा आपके व्यवहार का दर्पण मात्र है।

प्रवेश पांडेय

Comments

  1. Excellent proud of you. You have very simply given a vision on Dharam. I totally agree with you and have given me a new thought of Ramayana.

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  2. Excellent proud of you. You have very simply given a vision on Dharam. I totally agree with you and have given me a new thought of Ramayana.

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  3. पूर्णरूपेण सहमत।

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  4. Yes I totally agree with your ideas sir dharm is a very vast word and as a human being we should consider humanity whether we belong to do any religion. Actually Hindu religion very beautifully caters to the problem and solution of a common man through the Ramayana and Mahabharata. I think if a a person is willing to learn and make changes in his own life we can learn from any religion . Humanity is the base of all religion.

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  5. धर्म की बहुत ही विस्तृत और सटीक व्याख्या की है आपने सर । निश्चित रूप से इससे धर्म संबंधी अनेक प्रश्रों का उत्तर मिल जाएगा ।

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  6. Very nice good job bhai ji

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  7. Very enlightening and thought provocking article sir!!
    धर्म की इस परिभाषा का अनुसरण यदि सभी भारतीय सच्चे मन से करें तो धार्मिक मतभेद का सवाल ही नहीं।

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