कोरोना वैक्सीन

कोरोना वैक्सीन
अभी हाल ही में सर गंगाराम अस्पताल में 37 डॉक्टर कोरोना पॉजिटिव पाए गए। अगले ही दिन खबर आई कि एम्स में भी करीब 35 डॉक्टरों की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। और भी कई राज्यों से इस तरह डॉक्टरों के पॉजिटिव होने की खबरें आ रही हैं। हमें यह ज्ञात होना चाहिए इन सभी डॉक्टरों को वैक्सीन की दोनों खुराक लगाई जा चुकी थी। इनमें से कुछ डॉक्टर तो ऐसे भी हैं, जिन्हें दोबारा कोरोना का संक्रमण हुआ है। इस तरह की खबरें वाकई डरा देने वाली हैं। क्या हम यह माने की वैक्सीन से कोई लाभ नहीं हो रहा। जब वैक्सीन अपने निर्माण के दौर में थी, तब यही कहा जा रहा था कि वैक्सीन ही एकमात्र उम्मीद की किरण है। परंतु लगभग 9 करोड़ लोगों को वैक्सीन लगाई जा चुकी है और स्थिति ज्यों की त्यों है। जिन्हें वैक्सीन लग चुकी है, उन्हें भी कोरोना हो रहा है। क्या वैक्सीन आपदा में अवसर मात्र है और कंपनियां वैक्सीन के नाम पर अपनी जेबें भर रहे हैंं। पहले कहा गया कि वैक्सीन लगने के बाद कोरोना वायरस नहीं होगा। और जब वैक्सीन के बाद भी कोरोना हुआ तो यह कहा जा रहा है कि, वैक्सीन के बाद भी कोरोना हो सकता है, परंतु आप, और लोगों के मुकाबले जल्दी ठीक हो जाएंगे। क्या यह मजाक है? क्या लोगों को बेवकूफ बनाया जा रहा हैै? क्या वैक्सीन मात्र एक इम्यूनिटी बूस्टर है। जो बीमारी होने से तो नहीं रोक सकती, लेकिन होने के बाद बीमारी से लड़ने में आपकी सहायता कर सकती है। यदि ऐसा ही है तो जब पिछले वर्ष पतंजलि ने कोरोना वायरस से लड़ने के लिए कोरोनिल बाज़ार में उतारी थी, तो इन्हीं डॉक्टरों ने कोरोनिल को यह कहकर क्यों ठुकरा दिया थाा, कि यह मात्र एक इम्यूनिटी बूस्टर है। क्यों नहीं सरकार ने सभी को कोरोनिल लेने की सलाह दी। जब कोरोनिल और वैक्सीन दोनों ही इम्यूनिटी बूस्टर मात्र है। तो एक को नकार कर दूसरे को सिर माथे क्यों बिठाया जा रहा है। क्या सिर्फ इसलिए की एक आयुर्वेदिक दवा है और दूसरी अंग्रेजी दवा। क्या अंग्रेजी डॉक्टर इस बात को हज़म नहीं कर पा रहे थे कि आयुर्वेदिक दवा महामारी को कैसे रोक सकती हैै। क्या यह डॉक्टरों की संकुचित मानसिकता को नहीं दर्शाता। एक प्रश्न अभी भी मेरे मन में यह है कि एक वैक्सीन जिसे सिर्फ इमरजेंसी इस्तेमाल का लाइसेंस प्राप्त हैै। किस आधार पर पूरी आबादी को लगाई जा रही है। भारत में कोरोना अब विकराल रूप लेता जा रहा है। सरकारें अब कोरोना को लेकर पहले की तरह गंभीर नहीं हैै। अर्थव्यवस्था का हवाला देकर और लोगों के सामने रोजी-रोटी के संकट को लेकर लॉकडाउन भी नहीं लगाया जा सकता। सरकारी सिर्फ स्कूल बंद करके अपनी पीठ थपथपा रही हैै और यह दिखाने की कोशिश कर रही हैैं कि सरकारों को बच्चों की चिंता है। जबकि असल में सरकारें बच्चों को मीठा जहर दे रही है। जिसका खामियाजा बच्चों व देश को बाद में भरना पड़ेगा। वापस विषय पर आते हुए मेरी सरकार को यही सलाह है कि कोरोना को महामारी घोषित न करते हुए बल्कि एक सामान्य बीमारी घोषित कर देना चाहिए। ताकि सभी का जीवन सुचारु रुप से चल सके। जब एक बड़ी आबादी को कोरोनाा हो जाएगा। तो उसके बाद वायरस अपने आप ही शांत हो जाएगाा। विचार कड़वा है पर अच्छा है।

प्रवेश पांडेय

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

सीता के राम

मोबाइल फोन

राम का धैर्य