मार्च का महीना
मार्च का महीना
भारत में मार्च के महीने का अपना विशेष महत्व है। क्योंकि मार्च के महीने में होली आती है और होली भारतीय बच्चों के सबसे पसंदीदा त्योहारों में से एक है। खासतौर पर 12वीं तक के बच्चों के लिए। हर वर्ष बच्चों के मन में यही डर रहता है कि कहीं होली उनकी परीक्षाओं के बीच में ना पड़ जाए। ऐसा कई बार हुआ होगा, जब होली परीक्षा के बीच में पड़ी होगी और इस वजह से बच्चे मायूस हुए होंगें। परंतु वर्ष 2021 के मार्च में ऐसा कुछ नहीं हुआ। किसी भी बच्चे को परीक्षा की वजह से होली मनाने में कोई परेशानी नहीं हुई। ऐसा इसलिए नहीं कि होली मार्च के अंत में थी बल्कि इसलिए क्योंकि इस बार परीक्षाएं ऑनलाइन होनी थी। ऑनलाइन परीक्षा देने का भी अपना ही मजा है। इस तरह की परीक्षा में बच्चों को मेहनत नहीं करनी पड़ती। सिर्फ पूछे गए प्रश्नों के उत्तर ढूंढने होते हैं और उत्तर ढूंढने में भी बच्चों को ज्यादा मेहनत की आवश्यकता नहीं है, सिर्फ गूगल पर डालो और उत्तर आपके सामने। मैं यह नहीं कह रहा कि सभी बच्चे ऐसा कर रहे हैं परंतु अधिकांश बच्चों का यही हाल है। इस वर्ष कोई भी छात्र किसी भी कक्षा में फेल नहीं हुआ। सभी बच्चे अगली कक्षा में चले गए। वैसे एक शिक्षक होने के नाते मुझे इस बात की खुशी होनी चाहिए कि सभी बच्चे पास हो गए। हां, मुझे थोड़ी खुशी जरूर है पर उससे कहीं अधिक शिक्षा प्रणाली के ध्वस्त होने का दुख है। वैसे तो कुछ छात्र चोरी छुपे परीक्षा में पहले भी नकल कर लिया करते थे, लेकिन ऑनलाइन परीक्षा ने नई तरह की नकल को बढ़ावा दिया है। इस तरह की नकल में शिक्षक सब कुछ जानते हुए भी कुछ नहीं कर सकता। अभिभावक जानकर भी अंजान बना हुआ है और छात्र को अपने भविष्य की कोई फिक्र नहीं। उसे सिर्फ येन - केन प्रकारेण परीक्षा में सफल होने से मतलब है ज्ञान से कोसों दूर। ना ही देश की सरकारों की शिक्षा में कोई रुचि है। विद्यालय ऐसे संस्थान हैं जहां से सरकारों को कोई आमदनी नहीं होती सिर्फ खर्च ही करना पड़ता है। इसलिए विद्यालयों को खोलने के प्रति सरकारें उदासीन रही। सरकार में बैठे नेताओं ने तो अपना भविष्य उज्जवल कर लिया परंतु उन्हें देश के भविष्य अर्थात बच्चों से कोई लेना देना नहीं। जहां से सरकारों को कमाई होती है, वह जगह लॉकडाउन के बाद सबसे पहले खोली गई अर्थात शराब की दुकानें।
एक शिक्षक व स्कूल में मिली जिम्मेदारियों के नाते मेरा सामना ऐसे कई अभिभावकों से हुआ जो कोरोना की आड़ में ऑनलाइन परीक्षा के लिए स्कूल में अर्जी दे रहे थे। असल में उन्हें अपने बच्चों के फेल होने का डर था। जिन बच्चों की कंपार्टमेंट आई थी उनके भी अभिभावक यही दलील दे रहे थे कि एक बार ऑनलाइन परीक्षा का मौका उन्हें भी दिया जाए ताकि उनका बच्चा भी पास हो सके। अभिभावकों की यह बात सुनकर मन में दुख भी होता था और गुस्सा भी आता था। परंतु अपने गुस्से को मन ही मन समेटे हुए, अभिभावकों को सही उत्तर दे पाने में असमर्थ रहा। वर्ष 2020 - 21 में शिक्षा प्रणाली में जो कुछ भी हुआ वह सही नहीं था और इसका खामियाजा देश को भविष्य में भुगतना पड़ेगा। देश से भी ज्यादा उन बच्चों को जिन्होंने ऑनलाइन क्लास और ऑनलाइन परीक्षा के नाम पर खुद को धोखे में रखा। हमारे देश में ऐसे भी बच्चे हैं जो परीक्षा रद्द होने पर तो खुश होते हैं और सरकार द्वारा पब्जी पर बैन लगाने पर दुखी हो जाते हैं। यही बच्चे भविष्य में रोजगार की तलाश में इधर-उधर भटकते हैं और फिर सरकारों को दोष देते हैं। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि सबकुछ जल्द ही ठीक हो जाए और सभी स्कूलों में 2020 से पहले की स्थिति पुनः लौट आए।
प्रवेश पांडेय
अति उत्तम भ्राता जी
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