कर्तव्य और अधिकार

कर्तव्य और अधिकार 

मुझे मेरे सारे अधिकार चाहिए पर कोई मुझे मेरे कर्तव्य ना ही याद दिलाएं तो बेहतर। वर्तमान समय में ज्यादातर लोगों की यही कहानी है। कर्तव्य और अधिकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो कार्य किसी के लिए अधिकार है, वही कार्य किसी दूसरे के लिए कर्तव्य। जैसे शिक्षा प्राप्त करना बच्चों का अधिकार है, तो वहीं शिक्षा देना शिक्षक का कर्तव्य है। यदि शिक्षक अपने कर्तव्य का निर्वाह अच्छे से करें, तो छात्रों को कभी भी अपने अधिकार के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ेगा। वहीं दूसरी ओर यदि शिक्षक के अधिकारों की बात करें, तो यदि शिक्षक से ऊपर बैठे अधिकारीगण अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन करें, तो शिक्षक को अपने अधिकारों की कभी चिंता नहीं होगी। यह मात्र एक उदाहरण है अपनी बात को रखने का कृपया इसे अन्यथा ना लें। जीवन एक संघर्ष है और ज्यादातर लोग यह संघर्ष अपने अधिकारों की मांग करने या उसके बारे में बात करके ही निकाल देते हैं। भारत देश की परिस्थितियां भी कुछ ऐसी ही है। यहां आए दिन कोई न कोई अपने अधिकारों की मांग को लेकर धरना प्रदर्शन करने लग जाता है। लेकिन इन प्रदर्शनों से होने वाली आम जनता की परेशानियों के बारे में कभी नहीं सोचता। यहां मेरा यह कहना बिल्कुल नहीं है कि लोगों को अपने अधिकारों की मांग नहीं करनी चाहिए, मांग करनी चाहिए परंतु किसी और के कार्य में बाधा पहुंचाकर नहीं। यहां यह बात भी विचारणीय है कि यदि ऊपर बैठे लोग अपने कर्तव्यों का सही ढंग से निर्वाह करें, तो शायद ऐसी नौबत ही ना आए । आज का मनुष्य इतना स्वार्थी हो गया है कि उसने दूसरों के बारे में सोचना बिल्कुल ही छोड़ दिया है। वरना भारतीय संस्कृति व सभ्यता में हमेशा कर्तव्य पालन ही सिखाया गया है अधिकारों की बात तो कभी की ही नहीं गई। वैदिक काल में ऋषियों और मुनियों ने देश व धर्म के प्रति अपने कर्तव्यों का हमेशा ही निष्ठा से पालन किया है और उसके बदले कभी भी अधिकारों की मांग नहीं। वैदिक काल में राजाओं ने भी ऋषियों, मुनियों व प्रजा के प्रति अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा व ईमानदारी से पालन किया है। यदि हम प्रभु राम का जीवन चरित्र देखें तो राम का जीवन केवल अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित था। उन्होंने कभी भी अपने अधिकारों की मांग नहीं की। राम ने अपने पिता, अपने परिवार, अपने भाई, अपने देश व अपनी प्रजा के प्रति हमेशा अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा व ईमानदारी के साथ पालन किया, लेकिन कभी भी अपने अधिकारों को अपने कर्तव्य पथ पर हावी होने नहीं दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने भी हमें यही शिक्षा दी है कि कर्म करें और फल की इच्छा ना करें। अर्थात् अपने कर्तव्यों को पूरा करें और उन कर्तव्यों के बदले किसी फल की इच्छा ना करें। यदि आप कर्तव्य करेंगे तो फल आपको स्वयं प्राप्त होगा। वर्तमान परिस्थितियां ऐसी नहीं है। आज राजा अर्थात् सरकार व प्रजा के बीच कर्तव्य व अधिकारों को लेकर संघर्ष काफी बढ़ गया है ना तो प्रजा अपने देश के प्रति कर्तव्यों को लेकर जागरूक है और ना ही राजा प्रजा के प्रति अपने कर्तव्यों को लेकर चिंतित है। दोनों को सिर्फ अपने अधिकारों की चिंता है कर्तव्यनिष्ठा कि नहीं। यह स्थिति सिर्फ राजा व प्रजा की ही नहीं है। कमोबेश यही स्थिति हर परिवार हर समाज वह हर संस्था की है। हमें हर जगह ऐसे लोगों की भीड़ मिल जाएगी जो अपने अधिकारों की बात तो करते हैं, पर कर्तव्य की बात आते ही नाक भौं सिकोड़ने लगते हैं। समाज के प्रत्येक मनुष्य को अपनी इस मनोस्थिति में बदलाव लाने की आवश्यकता है। हमें अपने कर्तव्यों की बात पहले करनी चाहिए और अधिकारों की बाद में यदि हर मनुष्य अपने कर्तव्यों पर ईमानदारी से ध्यान देने लगे तो शायद अधिकारों की मांग स्वत: समाप्त हो जाएगी।

प्रवेश पांडेय

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