मनुष्य अपने विनाश का कारण स्वयं
मनुष्य अपने विनाश का कारण स्वयं।
क्या मानव जाति विनाश की ओर अग्रसर है? या प्रगति की ओर। क्या जिसे मनुष्य अपना विकास समझ कर खुश हो रहा है असल में वही उसके विनाश का कारण है? क्या सही मायने में मनुष्य प्रगति कर रहा है? क्या वर्तमान की प्रगति मनुष्य को विनाश की ओर ले जा रही है? क्या आज के समय में टूटते हुए समाज व बिखरते हुए परिवार प्रगति की निशानी है? एक कहावत प्रचलित है कि मनुष्य जो गड्ढा दूसरों के लिए खोदता है स्वयं उसी का ग्रास बनता है। तो क्या आज के समय की प्रगति वही गड्ढा है जिसमें मनुष्य एक दिन स्वयं गिरेगा। प्रगति के सही मायने क्या हैं। क्या अधिक से अधिक धन अर्जित करना बड़े-बड़े कोठियों व बंगलों में रहना लंबी - लंबी गाड़ियों में घूमना ही प्रगति है? क्या जिन लोगों के पास यह सब सुख सुविधाएं हैं वह स्वयं को प्रगतिवान समझ सकते हैं? आखिर प्रगति की परिभाषा क्या है? आज के समय में मनुष्य के बाहरी और आंतरिक जीवन में भारी अंतर है। जहां एक तरफ मनुष्य अपने बाहरी जीवन में खुद को मिलनसार सब का हितैषी दिखाने का दिखावा करता है। तो अंदर ही अंदर वह दूसरों के विकास के प्रति द्वेष रखता है। आज के समय में ज्यादातर मनुष्य को दूसरों का विकास सहन नहीं होता। बाहरी तौर पर तो वह ऐसा प्रदर्शन करेंगे कि वह बहुत प्रसन्न है, परंतु भीतर से दुखी होंगे। मनुष्य ने जिस तरह विकास के नाम पर अपनी जीवन शैली तथा खान-पान में बदलाव किया है, उसने अपने शरीर को बीमारियों का घर बना लिया है। वर्तमान समय में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो किसी ना किसी बीमारी की दवा ना ले रहा हो। ज्यादातर मनुष्य अपने समाज व परिवार से कट गया है। ऐसे लोगों की संख्या बहुत मिल जाएगी, जिनके फेसबुक पर तो हजारों मित्र हैं परंतु वास्तविक जीवन में वे अकेले हैं। वर्तमान समय में जितने भी लोग शादी समारोह में शामिल होते हैं, उनमें से अधिकांश लोगों का दूल्हा और दुल्हन से कोई लेना देना नहीं होता। यहां तक की यह लोग जयमाल के समय तक समारोह में रुकते भी नहीं है। परिवार के लोगों से भी इनका कोई बहुत ज्यादा संबंध नहीं होता। यह सब जानते हुए भी ऐसे लोगों को सिर्फ दिखावे के लिए शादी समारोह में बुलाया जाता है। आज का मनुष्य दिखावे के इस मायाजाल में इतनी बुरी तरह फस गया है कि अब इन परिस्थितियों से निकल पाना उसके लिए संभव नहीं है। इन्हीं सब कारणों से कई मनुष्य अंदर से खोखले होते जा रहे हैं और अवसाद से ग्रसित हो रहे हैं। अभी भी समय है यदि वक्त रहते इंसान ने खुद को नहीं संभाला तो आने वाला समय और भी कठिन होगा।
प्रवेश पांडेय
सर वास्तव में बहुत गंभीर प्रश्नों को उठाया है आपने। मनुष्य आधुनिकता और विकास के नाम पर अपनी जड़ों को छोड़ता जा रहा है और यही कारण है कि स्वयं को आधुनिक या प्रगतिशील दिखाने की होड़ में वह ईर्ष्या के जाल में उलझता चला जाता है। वह इस बात से खुश नहीं कि उसके पास क्या है बल्कि इससे दुखी है कि दूसरे के पास इतना भी क्यों है। बिलकुल सही कहा आपने सर अपनी जीवन शैली और रिश्तों को लेकर पुनर्विचार करने की जरूरत है।
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