कोरोना - प्राकृतिक आपदा या विज्ञान की देन

                                                   कोरोना - प्राकृतिक आपदा या विज्ञान की देन


वर्तमान समय में पूरा विश्व कोरोना नामक एक भयंकर आपदा से जूझ रहा है| विश्व के सभी देश चाहे वह स्वयं को कितना ही विकसित या विकासशील समझते हो, इस आपदा के आगे नतमस्तक हैं| लगातार बढ़ती हुई मरीजों की संख्या और बढ़ते हुए मृत्यु के आंकड़े, अभी भी पूरे विश्व को डरा रहे हैं| कोरोना का पहला मामला चीन में दिनांक 17 नवंबर 2019 को सामने आया था और आज करीब एक साल बाद भी कोरोना को लेकर स्थिति नियंत्रण में नहीं है| विश्व के तमाम बड़े देशों में कोरोना का टीका विकसित करने की होड़ लगी हुई है| कुछ देशों ने तो टीके का प्रयोग भी प्रारंभ कर दिया है| जल्दबाजी में बनने वाला टीका कोरोना को रोकने में कितना सहायक होगा, यह तो समय ही तय करेगा| लेकिन वर्तमान समय में सभी देशों की उम्मीदें टीके पर लगी हुई है, कि टीका आएगा और सब कुछ ठीक हो जाएगा|  वर्तमान समय में विज्ञान ने खुद को इतना विकसित कर लिया है कि वह इस बीमारी पर विजय अवश्य प्राप्त कर लेगा| परंतु क्या आपने कभी यह सोचा है, कि इस बीमारी की देन भी विज्ञान ही है| विज्ञान ने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि बीमारी बनी कैसे और इतनी गति से पूरा विश्व कैसे, इस बीमारी की चपेट में आ गया| भारत के वित्त मंत्री ने तो इस बीमारी को ईश्वर या प्राकृतिक आपदा कह कर टाल दिया, कि यह बीमारी प्रकृति अर्थात ईश्वर की देन है| क्या इस तरह की बीमारियों को प्राकृतिक आपदा का नाम देना सही होगा? क्या सही में यह बीमारी प्रकृति की देन है? क्या प्रकृति इतनी निर्दयी है जो स्वयं की बनाई सृष्टि को इतने बड़े संकट में डाल देगी| जहां तक मेरा मानना है प्रकृति कभी ऐसा नहीं करती| प्रकृति क्या कोई भी स्वयं की बनाई हुई चीज के साथ छेड़छाड़ नहीं करता| मेरा ऐसा मानना है कि इस आपदा का मूल कारण मनुष्य की बढ़ती हुई महत्वकांक्षी सोच है| मनुष्य का विकास के नाम पर प्रकृति के साथ छेड़छाड़ तथा विज्ञान का आवश्यकता से अधिक विकास करना है| किसी भी चीज की अति सदैव घातक होती है और विज्ञान अति विकास की ओर अग्रसर है| वर्तमान समय की कई मूल समस्याओं का कारण विज्ञान का अति विकास है| आज के समय की मूल समस्याएं जैसे वायु प्रदूषण, जलवायु असंतुलन, नई-नई बीमारियों का विकास, पानी की समस्या, जंगलों व वृक्षों की कमी आदि का मूल कारण विज्ञान का अति विकास है| हमारा विज्ञान इन समस्याओं से बचने के उपाय तो अवश्य सोच रहा है, परंतु इनके मूल कारण को जड़ से समाप्त करने पर कोई विचार नहीं कर रहा| और तो और मनुष्य स्वयं द्वारा विकसित सभी समस्याओं का दोष ईश्वर अथवा प्रकृति पर डालकर अपनी आंखों में धूल झोंक रहा है| विज्ञान द्वारा किया गया कोई भी अविष्कार अपने आप में पूर्ण नहीं है| विज्ञान जो भी बनाता है, केवल कुछ ही वर्षों में उसके दुष्प्रभाव सामने दिखने लगते हैं| विज्ञान यदि दवाई का अविष्कार कर रहा है तो उन दवाओं से ठीक होने वाली बीमारियां भी उसी विज्ञान की देन है| विज्ञान ने यदि बड़ी-बड़ी गाड़ियां और कारखानों का निर्माण किया है, तो उन से निकलने वाला धुआं आज हजारों मनुष्य की जिंदगी लील रहा है| विज्ञान द्वारा विकसित मोबाइल फोन वैसे तो सभी के कार्यों को आसान कर रहा है| परंतु यदि सही मायने में देखा जाए तो आज की युवा पीढ़ी को मोबाइल ने विनाश की ओर ढकेल दिया है|  ऐसे उदाहरणों की कोई कमी नहीं है, जिनसे हम यह साबित कर सकें कि विज्ञान द्वारा किए गए अविष्कार भविष्य में विनाश का कारण बन रहे हैं| यदि ऐसा ही चलता रहा तो विज्ञान का अति विकास इस पृथ्वी के विनाश का प्रमुख कारण बनेगा| अभी भी समय है यदि विज्ञान और मनुष्य ने अपनी महत्वकांक्षी आदतों पर लगाम नहीं लगाई, तो आने वाली पीढ़ी ना तो प्रकृति का आनंद ले पाएगी और ना हीअपने जीवन को सरलता से जी पाएगी| 


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