शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का उद्देश्य क्या होना चाहिए, यह एक अत्यंत ही जटिल प्रश्न है। इस प्रश्न का उत्तर दे पाना उससे भी अधिक जटिल कार्य है। परंतु शिक्षा क्षेत्र से जुड़े होने के नाते मेरा यह कर्तव्य है और अधिकार भी कि मैं अपने विचार इस विषय पर प्रकट करू। यह एक छोटा सा प्रयास है अपनी बात को आपके समक्ष रखने का। हो सकता है आप मेरे विचारों से सहमत हो या सहमत ना भी हो। वह मैं आपके अपने विवेक पर छोड़ता हूं। शिक्षा का उद्देश्य क्या होना चाहिए। इस प्रश्न का उत्तर एक शब्द अथवा एक वाक्य में दे पाना संभव नहीं। यदि हम शिक्षा के मुख्य उद्देश्य की बात करें, तो इसका मुख्य उद्देश्य धन कमाना तो नहीं हो सकता। हां शिक्षा धन कमाने में सहायक अवश्य हो सकती है। परंतु शिक्षा का मूल उद्देश्य धन कमाना नहीं हो सकता। मेरे विचार से शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान प्राप्त करना होना चाहिए। एक ऐसा ज्ञान जो मनुष्य के मानसिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक, सामाजिक तथा नैतिक मूल्य का विकास कर सके। शिक्षा का मूल उद्देश्य मनुष्य में उन गुणों का विकास करना होना चाहिए, जो उसे एक सभ्य समाज में किए जाने वाले आचरण तथा व्यवहार का ज्ञान दे सके। मनुष्य को अपने परिवार में किए जाने वाले व्यवहार का भी ज्ञान दिया जाना चाहिए। अपनी भावनाओं को समझने तथा विषम से विषम परिस्थितियों में भी धैर्य ना खोलें तथा संयम से कार्य करने की क्षमता का विकास करने पर भी जोर दिया जाना चाहिए। यदि हम आज की शिक्षा व्यवस्था को देखें, तो मेरा मानना है कि शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से भ्रमित हो चुकी है। आज की शिक्षा धन अर्जित करना तो सिखा रही है, परंतु मानव मूल्यों के विकास की तरफ किंचित भी ध्यान नहीं दे रही। शिक्षा प्रणाली एक ऐसी मशीन की तरह कार्य कर रही है जो ऐसे मनुष्यों का निर्माण कर रही है जो धन कमाना तो जानते हैं, परंतु मानवीय गुणों से रहित हैं। ऐसा नहीं है कि इसमें सारा दोष शिक्षा व्यवस्था का है। इस व्यवस्था को बनाने में समाज और परिवार का भी बराबर का योगदान है। आज के समय में जिसे हम विकास का नाम देते हैं, असल में वही विनाश का मूल कारण है। संकुचित होता समाज व छोटे होते परिवार, अपने परिवार में जन्मे बालक व बालिका को विकास की सही दिशा देने में अक्षम साबित हो रहे हैं। जिस तरह टेक्नोलॉजी ने पूरे समाज को अपनी चपेट में ले लिया है, उससे समाज एक दूसरे से दूर होता जा रहा है। यह बात सही है की टेक्नोलॉजी ने हमसे दूर बैठे व्यक्ति को पास ला दिया है, लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इसी टेक्नोलॉजी ने हमें अपने ही परिवार के सदस्यों से दूर भी किया है। मूल विषय पर वापस आते हुए मैं यही कहना चाहूंगा कि आज के युग में शिक्षा अपने आधारभूत उद्देश्य से विमुख हो चुकी है और इसे वापस पटरी पर लाने के लिए हम सबको सामूहिक प्रयास करने होंगे। वर्तमान समय को देखते हुए शिक्षा का प्रारूप कुछ इस तरह होना चाहिए, जो रोजगार प्राप्त करने में सहायक होने के साथ-साथ सामाजिक व नैतिक मूल्यों पर भी जोर दे। केवल धन सृजन के उद्देश्य से दी जाने वाली शिक्षा आने वाले समय में समाज और संस्कृति दोनों का पूर्णतया विनाश कर देगी। शिक्षा किसी भी समाज का दर्पण होती है और भारतीय सभ्यता व संस्कृति के संदर्भ में यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है कि शिक्षा का मूल उद्देश्य अपनी सभ्यता, संस्कृति व मानवीय गुणों को बनाए रखने के लिए दी जानी चाहिए ना केवल धन अर्जित करने के लिए। यदि मनुष्य गुणवान है, चरित्रवान है तथा सामाजिक है तो वह धन अर्जित कर अपने जीवन का निर्वाह अवश्य कर लेगा। परंतु यदि मनुष्य के पास अपार धन-संपत्ति है और उसका नैतिक जीवन शून्य के समान है तो ऐसे व्यक्ति को मनुष्य कहलाने का कोई अधिकार नहीं।

प्रवेश पांडेय

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