शाकाहार अथवा मांसाहार

 शाकाहार अथवा मांसाहार

शाकाहार अथवा मांसाहार यह विषय काफी समय से चर्चा का विषय रहा है। कई लोगों के बीच बात करते समय यह विषय सामने आता है, कि हमें मांसाहार का प्रयोग करना चाहिए या नहीं या फिर हमें शाकाहारी ही बने रहना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह शाकाहारी है या मांसाहारी अपने आप को सही साबित करने के लिए अलग-अलग तर्क प्रस्तुत करता है। शाकाहारी व्यक्ति के पास अपने तर्क हैं, कि शाकाहार सर्वोत्तम है और मनुष्य को केवल शाकाहार का ही प्रयोग करना चाहिए|  जबकि मांसाहार का प्रयोग करने वाले व्यक्तियों के पास अपने तर्क हैं, जब हमारे पास खाने के लिए ईश्वर ने मांसाहार बनाया है, तो हमें उसका सेवन करना चाहिएI प्रस्तुत लेख के माध्यम से इस विषय पर मैं अपने विचार प्रस्तुत करना चाहता हूं। आशा है मेरे विचारों को पढ़कर व्यक्ति अपनी मनोस्थिति में परिवर्तन ला पाएंगे। अपनी बात को प्रारंभ करने से पहले, मैं उन लोगों को जवाब देना चाहूंगा जो यह कहते हैं, कि शाकाहारी खाने में विभिन्नताएं नहीं है, सभी शाकाहारी व्यंजन खाने में एक जैसे होते हैं अथवा शाकाहार में बनने वाले व्यंजन प्रायः एक जैसा स्वाद देते हैं। ऐसे लोगों को मैं बता दूं की 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग तो हम अपने इष्ट प्रभु श्री कृष्ण को लगाते हैं, तो यह कहना कि शाकाहार में विभिन्नता नहीं है सरासर गलत है और एक कुतर्क जैसा है। दूसरा जब भी कोई शाकाहारी व्यक्ति यह तर्क देता है कि प्रत्येक जीव में प्राण होते हैं और उनकी हत्या करना पाप है। हत्या करने के उपरांत उन्हें अपना भोजन बनाना महापाप है। तो मांसाहारी व्यक्ति अक्सर यही कहते हैं कि पेड़ पौधों में भी जान होती है, तो उन्हें तोड़ना या उन्हें खाना भी गलत है। बात उनकी भी सही है कि पेड़ पौधों में जान होती है और आधुनिक विज्ञान ने यह सिद्ध भी किया है। बात को आगे बढ़ाने से पहले मेरा एक प्रश्न है कि हमें किन चीजों को खाना चाहिए जिनमें जान होती है या जिनमें जान नहीं होती। मेरा ऐसा मानना है कि हमें उन्हीं पदार्थों का सेवन भोजन के रूप में करना चाहिए जिनमें जान होती है या प्राण होते हैं प्राण रहित पदार्थों को लेने से सदैव हानि ही होगी। अब मूल प्रश्न पर आते हैं। क्या जानवरों और पेड़ पौधों में जो जान है वह एक समान है? क्या जीवो के जान की तुलना पेड़ पौधों के जान से की जा सकती है? नहीं। कदापि नहीं। आइए इसे समझने का प्रयास करते हैं। मान लीजिए एक आम का पेड़ है, जब हम आम को पेड़ से तोड़ते हैं तो क्या उस पेड़ की जान चली जाती है या उस आम की जान चली जाती है। नहीं जब हम आम को पेड़ से अलग करते हैं, तो पेड़ की जान भी बची रहती है और उस तोड़े गए आम में भी जान बनी रहती है। उस तोड़े गए आम की आयु 10 से 15 दिन की होती है। अपनी आयु को पूरा करने के बाद वह आम अपने प्राण त्याग देता है। आम बोलचाल की भाषा में कहें तो वह सड़ जाता है और खाने योग्य नहीं रहता। को उस आम को तभी तक खाया जा सकता है जब तक कि उसमें जान है। वहीं दूसरी ओर जब हम किसी जीव की हत्या करते हैं, तो हत्या करने के उपरांत उस जीव के प्राण निकल जाते हैं। उसमें कोई जान नहीं बचती वह एक मृत्य जीव कहलाता है और ऐसे मृत जीव को या लाश को खाने से मनुष्य को कोई लाभ नहीं होता। हम जो कुछ भी अनाज, फल, सब्जी, दाल आदि खाते हैं सब की आयु निर्धारित है और इन सब चीजों का सेवन मनुष्य तभी तक करता है जब तक यह जीवित है अर्थात मृत नहीं हो जाते या सड़ नहीं जाते। आयु पूरी होने के बाद यह सब चीजें खराब हो जाती हैं और लोग इन्हें नहीं खाते। क्योंकि आयु पूरी होने के बाद यदि हम इन्हें खाएंगे अर्थात सड़ जाने के बाद यदि हम इन्हें खाएंगे तो हमारी सेहत पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। ठीक उसी प्रकार जब हम जीव की हत्या कर उसे खाते हैं तो वह हमारी सेहत पर बुरा प्रभाव डालती है। यह तो हुई वैज्ञानिक आधार की बात कि हमें उन्हीं वस्तुओं को खाना चाहिए जिन वस्तुओं में प्राण हैं ना कि मृत वस्तुओं को। वही इसका दूसरा पक्ष मानवता का भी है। ईश्वर ने इस सृष्टि को बनाया है और इस सृष्टि में प्रत्येक जीव का अपना स्थान है। प्रत्येक जीव का इस सृष्टि में अपना योगदान है। लेकिन मनुष्य ने अपनी बुद्धिमत्ता से अन्य जीवो पर नियंत्रण रखा हुआ है और इस सृष्टि की सत्ता का संचालक वह स्वयं को मानने लगा है। इसलिए वह जो भी करें उसे सही लगता है। परंतु ऐसा नहीं है, प्रत्येक जीव एक समान है। किसी व्यक्ति द्वारा अपने भोजन के लिए दूसरे जीव की हत्या करना सही नहीं है, जब तक कि परिस्थितियां प्रतिकूल ना हो। कुछ लोगों का यह भी तर्क होता है कि यदि हम इन्हें नहीं खाएंगे तो इनकी जनसंख्या बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी। मित्रों ऐसा नहीं है इनकी जनसंख्या ज्यादा नहीं बढ़ेगी, अभी इनकी जनसंख्या सिर्फ खाने के उद्देश्य से जबरदस्ती बढ़ाई जा रही है ताकि ज्यादा से ज्यादा मात्रा में इनको उपलब्ध कराया जा सके। जहां तक जनसंख्या बढ़ने की बात है, तो मनुष्यों की जनसंख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है तो क्या मनुष्य आने वाले भविष्य में मनुष्य को भी खाना प्रारंभ कर देगा। अत्यंत ही विचारणीय प्रश्न है। अपने क्षणिक स्वाद के लिए किसी की हत्या करना गलत है और मैं इसका समर्थन नहीं कर सकता।

प्रवेश पांडेय

Comments

  1. पूर्णतः सहमत हूँ सर। जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन। शाकाहार सदैव सात्विक जीवन की आधारशिला माना गया है। किसी प्राणी से रक्तरंजित थाली आपके मन और आत्मा को कैसे शांत रख सकती है।

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