मैं कौन हूँ

 मैं कौन हूँ

क्या मैं प्रवेश पांडेय हूं I नहीं मैं प्रवेश पांडेय नहीं हूं I यह तो सिर्फ एक नाम है, जो मेरे माता पिता ने मेरे जन्म के बाद मुझे दिया I इस नाम का प्रयोग लोग मुझे पुकारने के लिए करते हैंI मेरे माता-पिता चाहते तो मुझे कोई दूसरा नाम भी दे सकते थे, इसलिए यह कहना कि मैं प्रवेश पांडे हूं, सरासर गलत होगा I वास्तव में यह जानने के लिए कि मैं कौन हूं या हम कौन हैं, यह बहुत ही गूढ़ विषय है I जिसका उत्तर इतनी आसानी से दे पाना सरल नहीं है, फिर भी मैंने एक प्रयास किया है कि मैं अपनी बात को रख सकूं और मानव जीवन के इस रहस्य पर थोड़ा सा प्रकाश डाल सकूंI कुछ लोगों का यह भी मानना हो सकता है कि यह जो शरीर है, यही मैं हूंI परंतु यह भी गलत है, क्योंकि हम जब भी अपने शारीरिक अंगों के बारे में बात करते हैं तो हम यही कहते हैं, यह मेरी आंख है, यह मेरे हाथ है, यह मेरा पैर है, यह कहना ठीक उसी तरह है जैसे हम यह कहते हैं, कि यह मेरी पुस्तक है I तो अगर हम कह रहे हैं कि यह पुस्तक मेरी है, तो वह पुस्तक मैं तो नहीं हूं I इसीलिए यह कहना कि यह हाथ मेरा है, मतलब मैं कोई और है l अतः इन बातों से यह स्पष्ट है की शारीरिक ढांचे को खुद की संज्ञा देना गलत है I अर्थात हमारा शारीरिक ढांचा और हम दोनों अलग-अलग हैं I इस बात को थोड़ा और स्पष्ट करने के लिए मैं यह कहना चाहूंगा कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो उसका शारीरिक ढांचा तब भी रहता है परंतु प्रत्येक व्यक्ति यही कहता है कि फला व्यक्ति की मृत्यु हो गई, यह उसका केवल शरीर मात्र है और जिस शरीर को लोग अग्नि के हवाले कर देते हैं l अर्थात लोग अनभिज्ञता के कारण अपने शरीर को ही खुद मान बैठते हैं l फिर वही प्रश्न उठता है कि मैं कौन हूं इन सब बातों से एक निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मैं वह हूं जो इस शरीर को चलायमान रखे हुए हैं I अर्थात जिसकी वजह से यह शरीर है और इस शरीर का वजूद है l तो अब प्रश्न यह उठता है कि वह कौन सी शक्ति है वह कौन सी अदृश्य ताकत है जो इस शरीर को चलायमान अवस्था में रखती है यदि हम धार्मिक ग्रंथों विशेषकर श्रीमद भगवत गीता को पढ़ें तो हमें यह ज्ञात होता है, कि उस अदृश्य शक्ति को आत्मा कहते हैं और यही आत्मा हमारे शरीर में वास करती है और हमारे शरीर को गति देती है I हमारी दैनिक क्रियाओं को हमारी सोचने व समझने की ताकत को व्यवस्थित करती है और जब व्यक्ति की मृत्यु होती है, तो आत्मा शरीर का त्याग कर देती है, तत्पश्चात शरीर निष्क्रिय हो जाता है I आत्मा का स्वरूप कैसा है क्या उसे देखा जा सकता है या सिर्फ महसूस किया जा सकता है I धार्मिक ग्रंथों के अनुसार आत्मा को शारीरिक आँखो से नहीं देखा जा सकता I श्रीमद भगवत गीता के अनुसार आत्मा भगवान का अंश होती है और शरीर त्यागने के बाद पुनः अपने किए कर्म के अनुसार प्रस्थान करती है I आत्मा को ईश्वर का अंश माना गया है, तभी यह कहा गया है कि अहम् ब्रह्मास्मि अर्थात मैं ही ब्रह्म, मैं ही श्रेष्ठ हूं, मैं ही ईश्वर हूं I इस कथन के अनुसार पृथ्वी पर मौजूद प्रत्येक प्राणी ईश्वर का ही अंश है अर्थात मैं या हम सभी ईश्वर का ही एक अंश है I पृथ्वी पर रहने वाला प्रत्येक मनुष्य चाहे वह किसी भी धर्म को मानता हो वह ईश्वर के अस्तित्व से इंकार नहीं कर सकता ईश्वर को मानने का स्वरूप अलग अलग हो सकता है I परंतु इस बात में जरा भी त्रुटि नहीं कि ईश्वर है I कुछ लोग ईश्वर के निराकार रूप की उपासना करते हैं तो कुछ लोग ईश्वर को साकार रूप में मानते हैं I आशा है प्रस्तुत लेख को पढ़ने के पश्चात आपके मन मैं खुद को जानने की जिज्ञासा और बढ़ गई होगी I

प्रवेश पांडेय

Comments

  1. वास्तव में सर बहुत ही सुंदर स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया है आपने शरीर और आत्मा के संबंध में। यह शारीरिक स्वरूप ही मनुष्य के मिथ्या अहंकार का कारण बनता है। यदि इस यथार्थ का ज्ञान सबको हो जाए तो पारस्परिक द्वेष और अहं जैसे भाव लेशमात्र भी जगह नहीं बना पाएँगे ।

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