मर्यादा पुरुषोत्तम राम
मर्यादा पुरुषोत्तम राम
राम क्या है ? राम कौन है ? राम के विषय में लिखना और राम को समझना, मुझ जैसे साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं | फिर भी यह एक प्रयास है अपने मन में चल रहे विचारों को लिखने का और अपने मन को शांत करने का | वैसे तो बचपन से ही राम को जानने और समझने की जिज्ञासा रही है | इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि मेरा पैतृक गांव राम की जन्मभूमि अयोध्या से काफी समीप है | जब भी गांव जाना होता है तो अयोध्या नगरी के मध्य से ही गुजारना पड़ता है | कई बार अयोध्या का भ्रमण कर चुका हूं और राम जन्मभूमि के दर्शन भी कर चुका हूं, शायद यही वजह होगी जो राम को लेकर अनेको विचार मन में आते रहते हैं | राम सिर्फ एक नाम नहीं वरन एक विचारधारा है, जीवन जिने की कला है जो हमें यह बताती है कि मनुष्य का आदर्श जीवन कैसा होना चाहिए |
राम और राम से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति हमें एक आदर्श जीवन जीने की कला सिखाता है, हमें यह बतलाता है कि औरों के प्रति हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए | जहां एक और राम का चरित्र एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति और आदर्श राजा के गुण सिखलाता है, तो वही भरत और लक्ष्मण आदर्श भ्राता के रूप से परिचय कराते हैं, सीता एक आदर्श पत्नी तो हनुमान एक आदर्श सेवक के कर्तव्यों से परिचय कराते हैं | रामचरितमानस का प्रत्येक क़िरदार हमें जीवन जीने की कला, जीवन के आदर्श मूल्यों तथा हम से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के प्रति हमारे कर्तव्यों को बतलाता है | राम एक आदर्श पुत्र थे, उन्होंने बिना किसी सवाल जवाब के अपनी माता के सिर्फ एक बार कहने मात्र से 14 वर्षों के लिए वन को प्रस्थान किया उन्होंने एक बार भी यह जानने की कोशिश नहीं की, कि आखिर उन्हें वन जाने के लिए क्यों बोला जा रहा है | राम चाहते तो अपनी माता का विरोध भी कर सकते थे और वन जाने से मना भी कर सकते थे पर उन्होंने एक बार भी इस बारे में नहीं सोचा और वन को प्रस्थान किया | राम की पत्नी सीता बिना यह सोचे की वन में कैसे रहेंगे, कैसे जीवन व्यतीत करेंगे अपने पति के साथ वन जाने की ज़िद करने लगी | सीता ने ना तो राम को वन जाने से रोका बल्कि स्वयं भी उनके साथ हो ली | वहीं दूसरी ओर जब भ्राता लक्ष्मण को वन गमन की बात पता लगी तो उन्होंने भी अपना भाई धर्म निभाते हुए अपने परिवार का त्याग किया, अपनी पत्नी को समझाया और अपने अग्रज राम के साथ वन जाना निश्चित किया | लक्ष्मण चाहते तो महल में रहकर एक राजकुमार का जीवन व्यतीत कर सकते थे, परंतु नहीं उन्होंने अपने भाई का साथ देना ज्यादा उचित समझा | वही यदि हम राजा दशरथ के चरित्र को देखें तो सिर्फ अपने दिए गए वचन को पूरा करने के लिए उन्होंने अपने प्रिय पुत्र राम का वन जाना स्वीकार किया | दशरथ एक राजा थे, चाहते तो अपने वचन से मुकर सकते थे, कैकेई को कठोर शब्दों में मना भी कर सकते थे, परंतु नहीं सिर्फ अपने दिए गए वचन को पूरा करने के लिए उन्होंने राम को वन जाने दिया, जिसकी कीमत उन्हें प्राण त्याग कर चुकानी पड़ी | भरत एक ऐसा चरित्र है, जिसका त्याग लक्ष्मण के त्याग से भी अधिक है | मेरा ऐसा मानना है कि भरत राम को सबसे अधिक प्रिय थे | भरत यदि चाहते तो राजा बनकर अयोध्या पर राज कर सकते थे उनकी माता की भी यही इच्छा थी | परंतु भरत ने राज को स्वीकार नहीं किया और राम की आज्ञा से अयोध्या में ही रहे, किंतु उन्होंने अयोध्या में ही 14 वर्षो तक एक वनवासी का जीवन व्यतीत किया | भरत का त्याग लक्ष्मण के त्याग से भी अधिक था, लक्ष्मण को कम से कम अपने राम के साथ रहने और उनकी सेवा करने का मौका तो मिला परंतु भरत को तो 14 वर्ष अपने राम से अलग रह कर बिताने पड़े | भरत और लक्ष्मण दोनों के चरित्र से ही हम एक अनुज के आदर्शों को सीख सकते हैं | हनुमान का तो राम से कोई सीधा संबंध नहीं था और ना ही हनुमान राम के परिवार से थे परंतु फिर भी इतना सेवाभाव, इस पूरी पृथ्वी पर हनुमान से बड़ा सेवक ना तो हुआ है और ना ही होगा | हनुमान ने कभी भी राम द्वारा दिए गए कार्यों को करने से मना नहीं किया अपितु ना ही कभी उस कार्य को करने का कारण पूछा | धन्य हो ऐसे हनुमान और उनके राजाराम | यदि हम राम के चरित्र को एक राजा के रूप में देखते हैं, तो एक राजा को अपनी प्रजा के प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिए किस प्रकार उनके विचारों का सम्मान करना चाहिए, इसे सीख सकते हैं | राजा का परम कर्तव्य है, अपनी प्रजा की सेवा करना और उनके विचारों का सम्मान करना | यदि राजा प्रजा के बीच सम्मान खो दे, तो उसे राजा बने रहने का कोई अधिकार नहीं | जब राम की पत्नी के प्रति उनकी प्रजा में अविश्वास का भाव उत्पन्न हुआ और प्रजा ने सीता के विषय में मनघड़न्त बातें करनी शुरू कर दी, तो उन्होंने अपने दिल पर पत्थर रखकर तथा जनता में अपना विश्वास बनाए रखने के लिए, अपने राजधर्म का पालन करते हुए, अपनी प्रिय पत्नी सीता का त्याग किया | वो सीता जिसने राम के साथ वन जाना तय किया था और 14 वर्षों तक वन में राम की सेवा की, ऐसी पतिव्रता स्त्री का त्याग राम के लिए अत्यंत कठिन था | किंतु प्रजा के बीच विश्वास बनाए रखने हेतु राम को राजधर्म का पालन करना पड़ा | उनका यह निर्णय एक पति के रूप में सही था या गलत इस पर अलग से विचार किया जा सकता है | उनका यह कार्य आज के राजनेताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत्र है कि किस तरह राम ने अपने परिवार को अपने राजधर्म के आगे नहीं आने दिया, वरना आज के नेता तो अपने और अपने परिवार के बारे में अधिक और देश के बारे में कम ही सोचते हैं | अंत में, मैं यही कहना चाहूंगा कि राम सिर्फ एक नाम नहीं बल्कि जीवन जीने की कला है यदि हम पांच प्रतिशत भी राम को अपने जीवन में उतार लें, तो हमारा जीवन स्वर्ग बन जाएगा और हमें जीने की एक नई प्रेरणा और मार्गदर्शन मिल जाएगा |
प्रवेश पांडेय
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